न्यूजीलैंड ने कैसे दिया कोरोना को शिकस्त: सीमाएं सीलकर व कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग से जीती लड़ाई, म्यूटेशन का पता लगाने के लिए हर पॉजिटिव शख्स की जीनोम सीक्वेंसिंग की

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5 मिनट पहले

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ऑकलैंड में वैक्सीन सेंटर के बाहर लगीं कतारें। - Dainik Bhaskar

ऑकलैंड में वैक्सीन सेंटर के बाहर लगीं कतारें।

  • न्यूजीलैंड में बाजार, दफ्तर, स्कूल पूरे एहतियात के साथ खुले हैं, संक्रमण रोकने की सतर्कता अब भी बीते साल जैसी
  • सिर्फ 25 एक्टिव केस, अब तक देश में सिर्फ 26 मौतें हुईं

​​​​​​न्यूजीलैंड में इस साल 28 फरवरी से अब तक 29 संक्रमित मिले हैं। अभी देश में सिर्फ 25 एक्टिव केस हैं। यहां बीते साल 26 फरवरी के दिन पहला केस आया था। तब से अब तक कुल 2623 केस आए हैं। इस महामारी में कुल 26 मरीजों की मौत हुई हैं। आज यहां कोई लॉकडाउन नहीं है।

सामुदायिक जीवन पूरी तरह से सामान्य हो चुका है। स्कूल, दफ्तर, दुकान, बाजार एहतियात के साथ खुले हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि न्यूजीलैंड ने बड़ी आबादी को सुरक्षित रखा है। यह सब इतना आसान भी नहीं था। बीते साल अप्रैल में हर दिन 89 केस आ रहे थे। 26 मौतें हो चुकी थी। ये मौतें सभी 20 जिलों में देखने को मिली थी।

50 लाख से अाबादी वाले इस देश में लोगों में यह डर बैठ गया था कि पूरा देश महामारी की चपेट में आ जाएगा। फिर सरकार और हेल्थ विशेषज्ञ इस पर सहमत हुए कि उनके पास दो ही विकल्प हैं- पहला या तो वायरस को पनपने (एलिमिनेशन) ही न दे या फिर संक्रमण दर को दबा (सप्रेस) दिया जाए और हर्ड इम्युनिटी हासिल करे, जैसे इन्फ्लुएंजा में किया जाता रहा है। सरकार ने पहला रास्ता चुना और जीरो कोविड का संकल्प लिया। बीते साल 19 मार्च को बॉर्डर सील कर दिए गए और 7 हफ्ते लंबा सख्त लॉकडाउन लगा।

इसका असर यह हुआ कि वायरस को फैलने के लिए कैरियर मिले ही नहीं और वे एलिमिनेट हो गए। हमारे अलावा चीन, ताइवान, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, मंगोलिया, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने इसी तरीके का इस्तेमाल किया। अब लक्ष्य टीकाकरण का है। अब तक 2.33 लाख आबादी को टीका लग चुका है। 60 हजार आबादी को दोनों डोज लग चुकी है।

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1 बॉर्डर पर क्वारेंटाइन सेंटर, विदेश से आने वाले लोगों को 28 दिन रखा गया
बंदरगाह और एयरपोर्ट पर क्वारेंटाइन सेंटर बने। दूसरे देश से आने वाले नागरिकों को 14 की जगह 28 दिन क्वारेंटाइन किया। देश में 7 हफ्ते का सख्त लॉकडाउन रहा। ऑकलैंड में नए मामले बढ़े तो यहां फिर सख्ती की गई। यह इलाका अगस्त से सितंबर और इस साल फरवरी से मार्च तक लॉकडाउन में रहा।

2 पुलिस को अतिरिक्त शक्तियां दी गईं, सिविल डिफेंस इमरजेंसी एक्ट लागू
लोगों को बाहर निकलने से रोकने के लिए पुलिस और सरकार को अतिरिक्त शक्तियां दी गई। सभी 291 बीच पर सिविल डिफेंस इमरजेंसी मैनेजमेंट एक्ट लगा। हजारों लोगों पर जुर्माना लगाया गया। कइयों को चेतावनी देकर छोड़ा गया, ताकि लोग लापरवाह न रहें।

3 कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, रैपिड टेस्टिंग, कम केस होने पर भी आबादी की 30% टेस्टिंग
फोकस कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और रैपिड टेस्टिंग पर रहा। मार्च 2021 तक 19 लाख टेस्ट हुए हैं, जो कुल आबादी का एक तिहाई है, जबकि देश में तब तक 2500 मामले आए थे। एक्सपर्ट जानते थे कि अगर कॉन्टैंक्ट ट्रेसिंग ठीक से नहीं हुई तो बड़ी टेस्टिंग काम नहीं आएगी क्योंकि वायरस को म्युटेशन का मौका मिल जाएगा।

4 रैपिड वैक्सीनेशन की जरूरत, ताकि समुदाय में इम्युनिटी पैदा हो सके
रैपिड वैक्सीनेशन आखिरी चरण है, तािक बड़ी आबादी में इम्युनिटी विकसित हो सके। अगर हम आंकड़े देखें तो जिन देशों ने एलिमिनेशन मॉडल अपनाया, उन देशों में 10 लाख आबादी पर 10 से कम मौतें हुई हैं। जहां सप्रेस मॉडल अपनाया गया, वहां 1 हजार से ज्यादा मौतें हुई हैं।

न्यूजीलैंड एकमात्र देश जहां हर संक्रमित की जीनोम सीक्वेंसिंग की गई, दूसरे देशों में यह संभव नहीं
अगर संक्रमण तेजी से फैल रहा हो तो जिनोम टेस्टिंग पर्याप्त मात्रा में करना होगा। ताकि म्यूटेशन का पता लगता रहे। न्यूजीलैंड के पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण के वरिष्ठ वैज्ञानिक माइकल बंज कहते हैं कि न्यूजीलैंड में हर संक्रमित व्यक्ति की जीनोम सीक्वेंसिंग की गई, जो बाकी देशों में अत्यधिक मामलों की वजह से संभव नहीं है। कोरोना वायरस के जीनोम में 30 हजार स्वरूप होते हैं।

जब भी यह किसी को संक्रमित करता है वो अपने किसी न किसी एक स्वरूप को बदल देता है। जीनोम सीक्वेंसिंग के माध्यम से वायरस के बदलाव को ट्रैक किया जा सकता है। इसी से यह भी पता लग सकता है कि कहीं पर संक्रमण हुआ है, तो आया कहां से और जा कहां रहा है। न्यूजीलैंड सरकार ने बीते साल अगस्त से इसे कोविड से निपटने के टूल के तौर पर अपनाया। (जैसा रितेश शुक्ल को बताया)

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