हरिद्वार कुंभ-2021: ऐसे बनते हैं नागा संन्यासी; छह साल कठिन तप, खुद का पिंडदान, डेढ़ लाख तक खर्च

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हरिद्वार11 घंटे पहलेलेखक: रितेश शुक्ल

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कुंभ के दौरान शरीर पर भस्म, बालों की लंबी जटाओं वाले निर्वस्त्र और दुनिया की मोह-माया से मुक्त नागा साधुओं का जमावड़ा आकर्षण का केंद्र होता है। - Dainik Bhaskar

कुंभ के दौरान शरीर पर भस्म, बालों की लंबी जटाओं वाले निर्वस्त्र और दुनिया की मोह-माया से मुक्त नागा साधुओं का जमावड़ा आकर्षण का केंद्र होता है।

  • अखाड़े में रजिस्ट्रेशन, तपस्या और गुरु सेवा जरूरी
  • हरिद्वार कुंभ जारी है, इससे जुड़ी अहम परंपरा

शरीर पर भस्म, बालों की लंबी जटाओं वाले निर्वस्त्र और दुनिया की मोह-माया से मुक्त नागा साधुओं को आपने देखा ही होगा। कुंभ के दौरान इनका जमावड़ा आकर्षण का केंद्र होता है। शरीर पर भस्म और हाथ में चिलम लिए साधुओं के इस संसार में यूं ही एंट्री नहीं मिल जाती।

इसके पीछे कम से कम 6 से अधिकतम 12 वर्षों का तप, गुरु की सेवा और किसी अखाड़े में रजिस्ट्रेशन जरूरी होता है। देश में साधुओं के 13 अखाड़े हैं। इस लंबी प्रक्रिया में अच्छा-खासा खर्च भी होता है। 51 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक खर्च भी आता है। रजिस्ट्रेशन की शुरुआती पर्ची 3500 रुपए की कटती है।

दीक्षा के तीन चरण, ऐसे पूरी होती है प्रक्रिया

संसारी व्यक्ति को सबसे पहले रजिस्टर्ड नागा साधु की शरण में जाना होता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु की सेवा करनी होती है। साधना-अनुष्ठान का अनुभव करना होता है। कम से कम 6 साल तपस्या के बाद गुरु संतुष्ट हों तो नागा साधु के रूप में रजिस्ट्रेशन हो सकता है।

चरण 1 : पंच संस्कार
शिष्य का जीते जी पिंडदान किया जाता है। इसके लिए पांच गुरु जरूरी होते हैं। 2007 से यह संस्कार करवाने वाले राजस्थान के महंत सूरज पुरी बताते हैं कि पांच गुरुओं का भारती, गीरी, सरस्वती, पुरी और दिगंबर संप्रदाय से होना जरूरी है। एक गुरु की दक्षिणा 11 हजार रुपए तक होती है। नेग व ब्राह्मण भोज खर्च अलग। कुल 51,000 तक खर्च होते हैं। शिष्य सक्षम हो तो ठीक, अन्यथा पूरा खर्च गुरु उठा सकते हैं। शिष्य यह ऋण नकद या सेवा से चुका सकते हैं।

यूं होता है संस्कार :

  • शिष्य को जनेऊ-कंठी पहनाते हैं। यह संकल्प की प्रतीक हैं।
  • वस्त्र त्याग दिगंबर बनने को प्रेरित किया जाता है ताकि वह खुद को प्रकृति में लीन समझे।
  • शरीर पर श्मशान की ताजा राख से शृंगार किया जाता है। यह खुद के पिंडदान को दर्शाता है।

चरण 2 : दिगंबर बनना
नागा साधु शिष्य बना सकता है, पंच संस्कार नहीं करवा सकता। इसके लिए उसे दूसरे चरण दिगंबर में प्रवेश करना होता है। इसकी अनुमति संन्यासी के अनुभव और प्रभाव के आधार पर दी जाती है।

चरण 3 : सिद्ध दिगंबर
दिगंबर बनने के बाद आखिरी सीढ़ी होती है सिद्ध दिगंबर बनना। इसके लिए किसी अखाड़े में पंजीयन की जरूरत नहीं पड़ती। यह पदवी तप से अर्जित शक्तियों के आधार पर अखाड़ा मानक डिग्री के तौर पर देता है।

अखाड़े की कटती हैं दो पर्चियां: दूसरे चरण में भी नागा संन्यासी को अखाड़े की पर्ची कटवानी होती है। एक पर्ची टोकन मनी के तौर पर 7100 रुपए की काटी जाती है। प्रक्रिया शुरू होने के बाद 21 हजार की दूसरी पर्ची कटती है। अनुष्ठानिक खर्च मिलाकर पूरी प्रक्रिया का खर्च करीब 30 हजार तक आता है।

इस साल जूना अखाड़े के पास 3000 आवेदन आए, 1000 को अनुमति : कठिन तप और गुरु की सेवा के बाद भी हर व्यक्ति नागा संन्यासी नहीं बन सकता है। अखाड़े आसानी से नागा संन्यासी बनने की अनुमति नहीं देते। जूना अखाड़े के सचिव व अंतरराष्ट्रीय कोतवाल महंत चेतन पुरी बताते हैं कि इस वर्ष अखाड़े के पास 3000 आवेदन आए थे। सिर्फ 1000 को ही नागा संन्यासी बनाया जा रहा है। बाकी अखाड़ों ने अभी संख्या की घोषणा नहीं की है।

स्थान भी अहम: उज्जैन वाले खूनी नागा, हरिद्वार वाले बर्फानी

हरिद्वार कुंभ : यहां दीक्षित नागा साधु बर्फानी कहलाते हैं। ये बिना गुस्सा हुए शांतिपूर्वक साधना करते हैं।

प्रयाग कुंभ : जो संन्यास लेकर राजयोग की कामना करते हैं, वे यहां दीक्षा लेते हैं। इन्हें राज-राजेश्वर नागा कहते हैं।

उज्जैन कुंभ : यहां दीक्षा लेने वाले नागा संन्यासियों को खूनी नागा कहा जाता है। ये गुस्सैल होते हैं।

नासिक कुंभ : यहां दीक्षित साधु खिचड़ी नागा कहलाते हैं। ये परिवेश अनुसार शांत या उग्र दोनों हो सकते हैं।

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