होली एक-रूप अनेक: पंजाब में मार्शल आर्ट का मेला तो मणिपुर में झोपड़ी जलाकर होलिका दहन, बंगाल में दोल उत्सव तो उत्तराखंड में बैठकी और खड़ी होली, जानिए 11 खास अंदाज

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4 मिनट पहले

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होली देश के बड़े त्योहारों में से एक है, लेकिन यह सिर्फ होलिका दहन और रंगों से खेलने तक सिमटा नहीं। पूरे देश में इसे मनाने के भी कई रंग हैं। हिंदी भाषी मैदानी इलाकों में खासतौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में होली दहन, पूजन और उत्सव का स्वरूप अमूमन एक जैसा है। मगर बाकी राज्यों में होली मनाने का बेहद निराले अंदाज हैं। तो आइए इस होली पर जानते हैं कि देश के 11 राज्यों में कैसे होली अपने ही खास अंदाज में मनाई जाती है…

नदी किनारे बनाते हैं झोपड़ी, फिर करते हैं उसका दहन

मणिपुर में होली का उत्सव छह दिनों तक होता है। इसे मणिपुरी भाषा में याओसंग कहते हैं। इस उत्सव में पूर्वोत्तर और हिंदी भाषी प्रदेशों का सांस्कृतिक मेल साफ नजर आता है। याओसांग का मतलब उस छोटी से झोपड़ी से है, जो पूर्णिमा की दोपहर शहर या गांव में किसी नदी या सरोवर के किनारे बनाई जाती है। बांस की यह झोपड़ी अब सड़क किनारे भी बनाई जाने लगी हैं। इसमें चैतन्य महाप्रभु की प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजन के बाद प्रतिमा से चैतन्य महाप्रभु की प्रतिमा निकालकर झोपड़ी को होली के अलाव की तरह जला दी जाती है। याओसांग की राख को लोग अपने माथे पर और अपने घरों की चौखट पर लगाते हैं। इससे अगले दिन को पिचकारी कहते हैं। पिचकारी के दिन लोग एक दूसरे को रंग लगाते हैं। बच्चे घर-घर जाकर चावल सब्जियां जमा करते हैं और इससे एक सामूहिक भोज किया जाता है। उत्सव के दौरान नौजवान मणिपुर का पारंपरिक लोक नृत्य थाबल चोंगबा करते हैं।

बंगाल में राधा-कृष्ण के प्रेम में डूबी दोल पूर्णिमा का उत्सव

पश्चिम बंगाल में होली को दोल उत्सव के नाम से जाना जाता है। इसे वसंतोत्सव और दोल पूर्णिमा भी कहते हैं। पूरे बंगाल में लोग इस दिन रंग और गुलाल से रंगे नजर आते हैं। दोल से एक दिन पहले होलिका दहन होता है, जिसे नेड़ा-पोड़ा कहते हैं। कुछ जिलों में होलिका दहन को चांचल भी कहते हैं। माना जाता है कि दोल पूर्णिमा के दिन ही राधा और उनकी सखियों के साथ कृष्ण रंग-गुलाल में सराबोर हो गए थे। दोल पूर्णिमा के दिन ही गंगा के नजदीक चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव हुआ था, इसलिए ही इसे गौर पूर्णिमा भी कहते हैं। शांति निकेतन में दोल उत्सव का मजा ही कुछ और है। विश्वभारती विश्वविद्यालय की छात्र-छात्राएं शांति निकेतन में इस दिन विशेष वेशभूषा में आती हैं और रवींद्र संगीत के साथ वसंतोत्सव मनाया जाता है। दोलजात्रा या दोल उत्सव के दिन सुबह-सुबह यहां की छात्राएं एक “ओरे गृहबासी खोल द्वार खेल” नाम का गाना गुनगुनाती हैं। ये सभी पीले परिधान में होती हैं। अबीर खेलते हुए छात्राएं कैंपस के अलग-अलग भवनों में जाती हैं।

पुआल की झोपड़ी में जलाकर होलिका दहन

ओडिशा के समुद्र तटीय जिलों में डोला उत्सव खासा मशहूर है। माना जाता है कि कामदेव यानी मदन के सम्मान में होने वाला मदनोत्सव समय के साथ डोला उत्सव बन गया। इस दिन कृष्ण को मदनमोहन के रूप में पूजा जाता है। ओडिशा इस साल 23 मार्च से डोला उत्सव शुरू हो चुका है। मगर कोरोना के चलते लगी पाबंदियों की वजह से लोग घरों पर ही इसे मना रहे हैं। आम दिनों में डोला उत्सव के दौरान बैंगनी रंग के अबीर से रंगे लोग मदनमोहन की सजी-धजी प्रतिमा और पालकी में ले जाते हैं। इस दौरान जुलूस में ढोल-वादक, पाइपर्स और संकीर्तन मंडल शामिल होते हैं। यह जुलूस घरों के आगे रुकता है और लोग उन्हें भोग लगाते हैं। चार दिनों तक इसे दोहराया जाता है। इस परंपरा को चाचेरी कहा जाता है। पूर्णिमा के दिन यह उत्सव समाप्त होता है। इस दौरान सार्वजनिक जगहों पर प्रतिमाओं को रखकर उनकी पूजा होती। इसके बाद एक ज्योतिषी उड़िया पंचांग को पढ़ता और वर्ष के दौरान होने वाली महत्त्वपूर्ण घटनाओं को बताता है। इसी वजह से कुछ लोगों का मानना है कि यह त्योहार नए साल का जश्न मनाने के लिए है। पखवाड़े के 14वें दिन एक समारोह होता है जिसमें पुआल की एक झोपड़ी को आग लगाने के लिए तैयार किया जाता है। इस परंपरा को ही होलीपोड़ा यानी होलिका दहन के रूप में जाना जाता है।

हल्ले के साथ हमला करके युद्ध कौशल दिखाते हैं सिख

सिखों के धर्मस्थान श्री आनंदपुर साहिब में होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते हैं। सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने होली के लिए होला मोहल्ला शब्द का प्रयोग किया था। यह शौर्य और वीरता का प्रतीक है। यह उत्सव तीन दिन चलता है। इस मौके पर घोड़ों पर सवार निहंग अपने खास हथियारों से युद्ध कौशल दिखाते हैं।

माना जाता है कि गुरु गोविंद सिंह ने खुद ही इस उत्सव की शुरुआत की थी। श्री आनंदपुर साहिब में होलगढ़ नामक स्थान पर होला मोहल्ले की परंपरा शुरू हुई। इसमें एक बनावटी हमला होता है, जिसमें पैदल और घुड़सवार शस्त्रधारी सिख दो दल बनाकर हमला करते हैं। मोहल्ला शब्द से भाव है, मय हल्ला। होला मोहल्ला शुरू किए जाने से पहले एक-दूसरे पर फूल तथा गुलाल फेंककर होली मनाने की परंपरा रही है। गुरु गोबिंद सिंह ने 1757 में सिखों के दो दल बनाकर एक पार्टी के सदस्यों को सफेद वस्त्र पहना दिए तथा दूसरे को केसरी। फिर गुरु जी ने होलगढ़ पर एक गुट को काबिज करके दूसरे गुट को उन पर हमला करके यह जगह पहले दल के कब्जे में से मुक्त करवाने के लिए कहा। होला मोहल्ला की मौजूदा परंपराओं की शुरुआत इसी आयोजन से जुड़ी है।

आंगन से शुरू होती है बैठकी होली फिर आती है खड़ी होली

देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं यानी अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, चंपावत और बागेश्वर में होली की तीन परंपराएं हैं। खड़ी होली, बैठकी होली, महिलाओं की होली। पौष मास के पहले रविवार से बैठकी होली की शुरुआत होती है। इसमें महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे के आंगन में रोजाना बैठकी होली मनाते हैं। इसमें ईश्वर को समर्पित पारंपरिक गीत गाए जाते हैं।

इसके बाद महा शिवरात्रि से खड़ी होली शुरू होती है, जिसमें महिलाएं और पुरुष समूह में कदम-ताल करते हुए गीतों पर झूमते हैं। यह पर्व लगातार चलता रहता है। अब यह कुमाऊं से निकलकर गढ़वाल में भी बड़ा पर्व बन गया है। जब केवल महिलाएं जमा होकर होली मनाती हैं तो उसे महिला होली कहते हैं। यह आमतौर पर घरों के आंगन में बैठकी होली के रूप में मनाई जाती है। जिसमें परंपरागत गीत संगीत के साथ इन दिनों फिल्मी संगीत ने भी जगह बना ली है। कुमाऊं में होली पर चीर और निशान बंधन की विशिष्ट परंपराएं हैं। होलिकाष्टमी के दिन गांवों और शहरों में सार्वजनिक स्थानों पर एकादशी का मुहूर्त देखकर चीर बांधा जाता है। कहीं-कहीं मंदिरों में भी यह चलन है। इसके लिए हर घर से एक एक नऐ कपड़े के रंग बिरंगे चीर लंबे लट्ठे पर बांधे जाते हैं। इस दौरान होलियां भी गाई जाती हैं। इसमें गणपति के साथ सभी देवताओं के नाम लिए जाते हैं।

सुपारी के पेड़ और मिट्टी के मगरमच्छ से शक्ति का पूजन

मलयाली भाषी आमतौर पर होली नहीं मनाते। केरल में मुख्यतः गौड़ सारस्वत ब्राह्मण और कोंकणी मूल का कुदुंबी समुदाय होली मनाता है। यहां होली को मंजल कुली या उकुली के नाम से जाना जाता है। राज्य के करीब 20 मंदिरों में चार दिनों तक होली से जुड़े समारोह होते हैं। सबसे बड़ा आयोजन कोच्चि के तुरुमला गोस्रीपुरम कोंकण मंदिर में होता है। कुछ मंदिरों में सुपारी का एक पेड़ काटकर लाया जाता है। यह पेड़ राक्षसों पर दुर्गा मां की जीत का प्रतीक माना जाता है। जबकि कुछ दूसरे मंदिरों में मिट्टी से एक मगरमच्छ बनाया जाता है। इस मगरमच्छ को उस देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जिसने गोवा से केरल की ओर पलायन करते हुए समुदाय की मदद की थी। उत्सव के आखिरी दिन कुदुंबी समुदाय पानी में हल्दी मिलाकर एक दूसरे डालते हैं। इस दौरान सभी लोग पारंपरिक गीतों पर नाचते गाते हैं।

पूर्व राजघरानों की शान शौकत और जनता से नाते की निशानी

राजस्थान में होली बाकी उत्तर भारत की तरह ही मनाई जाती है, मगर उनका अंदाज कुछ अलग होता है। खासकर पर राज्य के पुराने शाही परिवारों में। लेकसिटी उदयपुर इसके लिए पहचाना जाता है। यहां लगातार दो दिन होली मनाई जाती है। सिटी पैलेस मैदान में मुख्य दिन से पहले शाम से उत्सव शुरू होता है। इस उत्सव को मेवाड़ होलिका दहन कहा जाता है। इस होली दहन के दौरान मेवाड़ के पूर्व राज परिवार के सदस्य वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार होली का दहन करते है।

अगले दिन राजपरिवार शहर में एक बड़ा जुलूस निकालता है। शहरवाले थालिस यानी कीमती धातु की थालियों में रंग और मिठाई के साथ इस जुलूस का स्वागत करते हैं। इस जुलूस को देखने के लिए भी सैकड़ों विदेशी सैलानी पहुंचते हैं। हालांकि इस बार कोरोना वायरस के चलते होली का यह रंग यहां आने वाले सैलानियों को देखने को नहीं मिलेगा।

आदिवासी समुदाय का शिगमो अब शहरी कार्निवल में बदला

समुद्र तट पर मौज-मस्ती के सबसे बड़े केंद्र गोवा में होली भी इसी अंदाज में मनाई जाती है। गोवा में इस उत्सव को शिगमो नाम से जाना जाता है। यह मुख्य रूप से गोवा के आदिवासी समुदाय का धान की समृद्ध फसल के लिए उत्सव है। कुनबी, गवाड़ और वेलिप्स समेत खेती से जुड़े समुदाय के लिए यह उत्सव वसंत की शुरुआत का भी प्रतीक है। शिगमो उत्सव फाल्गुन-चैत्र महीने में एक पखवाड़े तक मनाया जाता है। यह हर वर्ष मार्च-अप्रैल में होता है। इस त्योहार की शुरुआत नमन के साथ होती है, जो गांवों में स्थानीय लोक देवताओं का आह्वान है। इसमें लोग घूमत, ढोल और ताशे बजाकर देवाताओं का आह्वान करते हैं। इस दौरान लोग पारंपरिक रंगीन वेशभूषा और रंगे चेहरों के साथ घोड़ेमोदिनी यानी घुड़सवार योद्धाओं का नृत्य, गोप और फुगड़ी जैसे लोकनृत्य करते हैं। गोवा के पर्यटन विभाग ने हाल के सालों में इसे नया रूप दिया है। सरकार शहरी इलाके में इस उत्सव को कार्निवल परेड के रूप में मनाती है। यह मूल रूप से एक ग्रामीण त्योहार का शहरीकरण जैसा है। इस कार्निवल में भारी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक हिस्सा लेते हैं। इस बार कोरोना के चलते यह कार्निवल पिछले सालों जैसा भव्य नहीं होगा। इस वर्ष 3 और 4 अप्रैल को यह कार्निवल होने की उम्मीद है।

भगवान को पालकी में बैठाकर लोगों की खुशहाली की करते हैं प्रार्थना

महाराष्ट्र में होली को रंग पंचमी और कोंकण के इलाके में शिमगा के नाम जाना जाता है। राजगढ़, रत्नागिरी और सिंधुगढ़ में फाल्गुन पूर्णिमा के पांच दिन बाद शिमगा मनाया जाता है। इस दौरान लोग एक दूसरे को जमकर रंग लगाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान उत्सव के दौरान भगवान उनके घर आते हैं। इस दौरान लोग भगवान को पालकी में बैठाकर नृत्य करते हैं और सामूहिक रूप से अपने परिवारों की सलामती का प्रार्थना करते हैं। परंपरा के अनुसार उत्सव के दौरान लोग एक दूसरे पर नीम, कुमकुम, हल्दी और जड़ी-बूटी से बना गुलाल और रंगीन पानी डालते हैं। कई गांवों में इस दौरान देवी-देवताओं की प्रतिमा के साथ रंगीन जुलूस निकाला जाता है। यह जुलूस मंदिरों से शुरू होते हैं।

उत्तर प्रदेशः राधा के गांव में कृष्ण के गांववाले खाते हैं लाठियां

उत्तर प्रदेश में ब्रज इलाके के बरसाना गांव में होली बिल्कुल अलग अंदाज में खेली जाती है। इसे लट्ठमार होली कहते हैं। ब्रज में होली को कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है। यहां होली में नंदगांव के पुरुष और बरसाने की महिलाएं हिस्सा लेती हैं। दरअसल, कृष्ण नंदगांव के थे और राधा बरसाने की। कृष्ण के नंदगांव की टोलियां पिचकारियां लिए बरसाना पहुंचती हैं तो उन पर बरसाने की महिलाएं खूब लाठी बरसाती हैं। पुरुष ढाल की मदद से महिलाओं की लाठियों से बचते हैं और महिलाएं इन्हें लाठी मार-मारकर रंग से भिगोती हैं। दोनों गांवों के लोगों का मानना है कि होली की लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती। अगर लग भी जाए तो वह घाव पर मिट्टी लगाकर फिर से लाठी खाने को तैयार हो जाता है। इस दौरान पूरे गांव में भारी मात्रा में गुलाल उड़ाया जाता है। पानी की बड़ी-बड़ी पिचकारियों से सभी को रंगीन पानी से भिगो दिया जाता है। इस दौरान भांग और ठंडाई भी जमकर बांटी जाती है। इस अनोखे उत्सव को देखने विदेश से सैकड़ों पर्यटक पहुंचते हैं।

बसंत पंचमी से शुरू होता है फाग गाना, ढोलक की थाप और मंजीरे पर झूम उठते हैं लोग

बिहार में बसंत पंचमी के बाद से होली के गीत गाए जाने लगते हैं। यह सिलसिला होली तक चलता है। इन गीतों को फाग कहा जाता है। बिहार के एक बड़े इलाके में इन्हें फगुआ नाम से जाना जाता है। होलिका दहन के अगले दिन सुबह से दोपहर तक धूल-कीचड़ और रंग से होली खेली जाती है। दोपहर को नहाकर भी रंग खेला जाता है। वहीं शाम को लोग एक दूसरे के घर जाकर फगुआ गाते हैं। इस दौरान गांवों में फगुआ के लिए चौपाल सजती हैं। लोग वहां जाकर होकर एक दूसरे रंग लगाते हैं और ढोलक मंजीरा, हारमोनियम बनाकर फगुआ गाते हैं।

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