मूवी रिव्यू: परिवार को बचाने की जुगत में भिड़े आम आदमी के एक्स्ट्राऑर्डिनरी बन जाने की कहानी, देखने लायक है मोहनलाल की ‘दृश्यम 2’

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7 घंटे पहलेलेखक: अमित कर्ण

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रेटिंग 4/5
स्टारकास्ट मोहनलाल, मीना, अनसिबा हासन, एस्थर अनिल, आशा सरत, मुरली गोपी, केबी गणेश कुमार
डायरेक्टर जीतू जोसेफ
प्रोड्यूसर एंटनी पेरुंबावूर
म्यूजिक डायरेक्टर अनिल जॉनसन
अवधि 2 घंटे 33 मिनट

‘दृश्यम2’ कहानी, पटकथा, संवाद, अदायगी और ट्रीटमेंट समेत हर मोर्चे पर परफेक्शन से लैस है। यह नितांत देखने योग्य है। लेष मात्र भी किरदारों पर कुछ थोपा हुआ नजर नहीं आया। फिल्म की राइटिंग और एडिटिंग इतनी सधी हुई है कि इसे देखते हुए कब ढाई घंटे गुजर जाते हैं, अहसास ही नहीं होता।

ऑर्डिनरी इंसान के एक्स्ट्राऑर्डिनरी बनने की कहानी

फिल्म की कहानी अपने परिवार पर आंच आने पर एक ऑर्डिनरी इंसान के एक्स्ट्राऑर्डिनरी हो जाने की है।कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां पिछला पार्ट छूटा था। नायक जॉर्जकुट्टी यानी मोहनलाल ने एक्स पुलिस ऑफिसर या प्रभाकर परिवार के बिगड़े साहबजादे की लाश आखिर कहां छिपाई, इसकी खोजबीन होती है।

इस बात को छह साल हो चुके हैं। मगर पुलिस इसका पता नहीं लगा पाई है। इससे लोगों के बीच पुलिस की बड़ी किरकरी है। इससे पुलिस विभाग का ईगो लगातार हर्ट हो रहा है। पुलिस अफसर भी मगर हार नहीं मानते हैं। पुलिस अफसर अपने तरीकों से दो साल की मेहनत में पता कर ही लेते हैं कि आखिर माजरा क्या था? इसके बाद क्या होता है? क्या वाकई पुलिस नायक को गुनहगार साबित कर पाती है? नायक अपने बचाव के लिए किन चीजों की जोरआजमाइश करता है, वह फिल्म है।

फिल्म का स्क्रीनप्ले है इसकी ताकत

फिल्म की ताकत इसका स्क्रीनप्ले है। पुलिस और जॉर्जकुट्टी के बीच शह और मात का खेल चलता रहता है। बाजी बारी-बारी से दोनों के हाथ लगती रहती है। स्क्रीनप्ले एक इंच भी अपने कोर वैल्यूज से दूर नहीं हटता। पुलिस की तफ्तीश के अलावा लेखक व निर्देशक जीतू जोसेफ ने प्लॉट में एक सब प्लॉट जोड़ा है। वह समाज और पड़ोसियों की प्रचलित धारणाएं हैं। प्यार, मोहब्बत में रिजेक्शन की बात हुई हो तो दोषी औरत ही है।

अगर गरीब ने बदला लिया है तो समाज की सांत्वनाएं उसके प्रति होती हैं। वही गरीब अगर कुछ सालों बाद अमीर हो जाए तो समाज की सांत्वना आगे चलकर ईर्ष्या में तब्दील हो जाती है। नायक जॉर्जकुट्टी की बड़ी बेटी के अतीत के चलते डर का भी प्लॉट समानांतर चलता है। ऑर्गेनिक तरीके से दिखाया गया है कि जब जब पुलिस उनके सामने से गुजरती है, उनकी हालत ढीली होती ही है। लाश छिपाने के बारे में पत्नी के बार-बार पूछने के बावजूद जॉर्जकुट्टी उससे कुछ जाहिर नहीं करता है। इसकी वजह भी न्यायोचित लगती है।

सभी की परफॉरमेंस सधी हुई

अदाकारी के लिहाज से मोहनलाल, मीना, मुरली गोपी आदि सबने सधी हुई परफॉर्मेंस दी है। राइटिंग में कानून को नीचा दिखाने का गिमिक नहीं है, ताकि दर्शकों को रोमांच की अनुभूति हो। हीरो कानूनी लूपहोल्स का सहारा लेता है, पर उसकी यह कवायद ताउम्र चल सकती है। यही शायद उसकी सजा भी है।

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