शुष्क क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का समुचित प्रबन्धन कैसे करें?

Farm model

Farm model

भारत वर्ष में खेती योग्य जमीन का लगभग 65 प्रतिशत क्षेत्रफल वर्षा पर आधारित है. एक अनुमान के अनुसार सन् 2025 तक सिंचाई के सभी उपायों के बावजूद भी लगभग 50 प्रतिशत जमीन पर की जाने वाली खेती वर्षा पर ही निर्भर रहेगी. सिंचित क्षेत्र में आई हरित क्रांति देश की बढ़ती हुई जनसंख्या को खाद्यान्न उपलब्ध कराने में कुछ हद तक ही सफल साबित हुई है. देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का 12 प्रतिशत उष्ण मरूस्थलीय क्षेत्र राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में स्थित है. ये क्षेत्र कम वर्षा, अधिक तापमान, तेज हवा की गति, अधिक वाष्पोत्सर्जन, कम मिट्टी उर्वरता एवं कम जल धारण क्षमता के कारण यहां फसलों की उत्पादकता बहुत कम है. पिछले पाँच दशकों में मानव आबादी में लगभग 400 प्रतिशत और पशु संख्या में 200 प्रतिशत बढ़ोत्तरी से इस क्षेत्र में न केवल संसाधनों (Resources) के प्रयोग एवं जमीन की उत्पादकता में बदलाव आया बल्कि प्राकृतिक संसाधनों एवं शुष्क परिस्थितिकी (Ecology) पर भी खतरा उत्पन्न हुआ है.

शुष्क क्षेत्र की मुख्य समस्याएँ (Main problems of dry area)

शुष्क क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता में टिकाऊपन लाने में कई समस्याएं आती हैं जो कि विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में अलग- अलग हैं, मगर शुष्क (सूखे) क्षेत्रों में इस प्रकार है-

  • कमजोर दर्जे की मिट्टी और अनियमित वर्षा का होना
  • फसलावधि के दौरान बीच-बीच में सूखे की स्थिति पैदा होना
  • चारे की कमी के कारण पशुओं में निम्न उत्पादकता यानि दूध की कम मात्रा.
  • स्थिति के अनुसार अनुसंधान (Research) संबंधी जानकारी की कमी.
  • अनुसंधान एवं विकास की प्रक्रियाओं में एकजुटता (Coordination) की कमी.
  • नई तकनीकी विकसित करने और उसका प्रसार करने में किसानों की भागीदारी का ना के बराबर होना.
  • कृषि तकनीकी प्रसार हेतु उपयुक्त संसाधनों की कमी.
  • ग्रामीण इलाकों में ढांचागत (Structural) बुनियादी सुविधाओं की कमी.

प्राकृतिक संसाधनों का इंटीग्रेटेड (सभी तरह से) प्रबंधन एवं विकास कैसे करें (Integrated management and development of natural resources)

मिट्टी, वनस्पति, पशुधन और वर्षा का जल इन क्षेत्रों के प्रमुख संसाधन है जिनका अच्छे तरीके से उपयोग कर विकास किया जा सकता है. उपयुक्त कृषि प्रणाली विकास के लिए यह जानना जरूरी है कि किसान फिलहाल क्या कर रहा है और उसके पास क्या साधन है. इस चिरस्थाई विकास के मुख्य पहलू ये हो सकते हैं-

  • मौजूदा संसाधनों की क्षमता के अनुसार जमीन की और पशुधन की उत्पादकता को बढ़ाना.
  • संसाधनों की आर्थिक दक्षता (economic efficiency) बढ़ाना. यानि क्षेत्र के वन, नदियां, तालाब, पशु, कृषि औजार आदि को इस प्रकार उपयोग करना की यहाँ के लोगों की आय में सीधी बढ़ोतरी हो.
  • प्राकृतिक संसाधनों जैसे वन, नदियां, तालाब, जंगल आदि को बचाना (सरंक्षण) और इनके उपयोग की दक्षता को बढ़ाना.
  • एकीकृत कृषि प्रणाली (integrated farming system) को अपनाना यानि पशुपालन, चरागाह और खेतीबाड़ी साथ में करना और अलग अलग फसलों को उगाना.
  • पशुओं की नस्ल सुधार पर जोर देना.
  • कृषि अनुसंधान संस्थानों में फसल उत्पादन की तकनीक और मिट्टी प्रबंधन सम्बंन्धी सिफारिशें किसानों के यहाँ लागू करना और सराकरी साधन, बीज-खाद मिलने की सुविधाएं देना.

यह माना जाने लगा है कि अकेले सामान्य फसलीकरण से शुष्क क्षेत्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं की जा सकती. इसलिए ऐसी कृषि प्रणाली की आवश्यकता है जिससे अनाज उत्पादन, पशुधन उत्पादन, परती जमीन का सही उपयोग करने के लिए पेड़ और घास उगाना आदि से अच्छा काम किया जा सके. कृषि वानिकी (agroforestry) शुष्क क्षेत्र की जमीन को मरूस्थल में परिवर्तित होने से रोकती है. मगर कृषि वानिकी किसानों को तभी आकर्षित कर सकती है, जब इससे उनके फायदे की कुछ और चीजें भी मिल सकें. जैसे पशुओं के लिए चारा मिल जाए. इसलिए कृषि वानिकी और पशुपालन, दोनों कों साथ-साथ चलाया जा सकता है. यदि औषधि देने वाले वृक्ष या फल देने वाले पौधें शामिल कर लिए जाएं तो और भी अच्छी कृषि-प्रणाली बन सकती है.

कृषि क्षेत्र के फार्म माॅडल्स (Farm Models of Agriculture area)

सूखे प्रभावित क्षेत्रों में निम्नलिखित फार्म मॉडल्स को विकसित किया जा सकता हैः

फसल विविधीकरण मॉडल (Crop diversification model)

यह मॉडल वर्षाकाल में कृषि करने वाले किसानों के लिए उपयोगी है. इसमें फसल विविधिकरण के लिए कुल खेत का 30 प्रतिशत भाग बाजरे में, 40 प्रतिशत भाग दलहनों में, 20 प्रतिशत भाग ग्वार, में तथा बचे हुए 10 प्रतिशत भाग में तिलहन फसलों की खेती पर जोर दिया जाता है. मानसून के 15-20 जुलाई तक आने पर ही यह मॉडल कार्य कर सकता है. अधिक विलम्ब होने पर फसल विविधीकरण में दालें, चारा उपयोगी फसलें (चवला, बाजरा) व तिलहन फसलों को ही लेना चाहिए. ऐसे किसानों को फसल विविधीकरण के साथ-साथ फसल चक्र, मिलवा खेती, जल्दी व मध्य काल में पकने वाली किस्मों का बीज, उन्नत सस्य क्रियाओं को भी महत्व देना चाहिए. ऐसे क्षेत्रों में वर्षा जल एवं भूमि प्रबन्धन को विशेष महत्व देना चाहिए. कृषि के इस मॉडल से किसान अपने 40-50 बीघा खेत पर 2-3 गाय व 8-10 भेड़ व बकरी को वर्ष भर पोषण कर सकते है तथा औसतन रू. 70,000 से 80,000 प्रति वर्ष आय अर्जित कर सकते है.

समन्वित कृषि मॉडल (Integrated farming model)

जो किसान ढ़ाणी (छोटे गांव) बना कर अपने खेत पर ही रह रहे है, उनके लिये कृषि विविधिकरण अपनाकर अधिक उत्पादकता, आय और लगातार कृषि विकास की प्रबल संभावनाएं है. इन कृषि मॉडल्स के पूर्ण विकास में 5-7 वर्ष का समय अवश्य लग जाता है किन्तु उसके बाद किसान की आय, जमीन व जल उत्पादक क्षमता में निरन्तर वृद्धि होती रहती है. इन माडल्स को अपनाकर मरू प्रदेश में किसान टिकाऊ खेती अपनाकर अपने व अपने परिवार के समग्र विकास को कर सकता है.

इस माडल को अपनी परिस्थितियों के अनुसार फेर बदल कर किसान 5-7 गायों, 15-20 भेडों व बकरियों का वर्ष भर पालन पोषण कर सकता है तथा विभिन्न कृषि उत्पादों जैसे चारा, लूंग व पालापशु आहार (ग्वार), अनाज, दालें, तिलहन, जलाऊ लकड़ी, गोबर व मीगणी की खाद, बेर आदि का भी उत्पादन कर सकता है. इस प्रकार वह अपने व अपने परिवार के लिये साल भर रोजगार प्राप्त करके 2 से 2.5 लाख रूपये की आमदनी प्राप्त कर सकता है. यह खेती अकाल व सूखे की स्थिति से भी कम प्रभावित होती है.

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