पंजाब निकाय चुनाव पर भास्कर विश्लेषण: पांच सवालों से समझिए… कांग्रेस की जीत और अकाली, भाजपा, आप की हार के मायने

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चंडीगढ़12 मिनट पहलेलेखक: बलदेव कृष्ण शर्मा

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पंजाब निकाय चुनाव पर भास्कर विश्लेषण। पांच सवालों से समझिए कांग्रेस की जीत और भाजपा, अकाली और आम आदमी पार्टी के हार के मायने।

कांग्रेस की जीत चौंकाने वाली है या यह उसकी स्वाभाविक जीत है?
-पिछले नतीजों को देखें तो पंजाब में जिसकी सत्ता होती है, उसी का लोकल बॉडी पर भी राज होता है। अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार के समय उन्होंने भी जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के खुश होने के कारण भी हैं। उसने अकालियों के परंपरागत गढ़ बठिंडा में अप्रत्याशित जीत दर्ज की है। हालांकि यहां बादल परिवार से वित्त मंत्री मनप्रीत बादल हैं, जो खुद इस चुनाव में वार्ड दर वार्ड एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे। इसी तरह पठानकोट की जीत भी कांग्रेस को खुशी दे रही है, क्योंकि यहां भाजपा हमेशा मजबूत रही है। सांसद सनी देओल की गुरदासपुर सीट के अंतर्गत आने वाले पठानकोट से ही भाजपा के सूबा प्रधान अश्वनी शर्मा भी आते हैं। वे अकेले वरिष्ठ भाजपाई थे, जो इन चुनाव में सक्रिय थे।

कांग्रेस की जीत और अकाली, भाजपा की हार में किसान आंदोलन के मुद्दे की कितनी भूमिका रही है?
-कांग्रेस की जीत में किसानों के मुद्दे ने भावनात्मक तौर पर ज्यादा असर दिखाया है। यही कारण था कांग्रेस ने विकास के काम गिनवाने का जोखिम लेने की बजाय किसानों के मुद्दे को शहरों में उठाया। स्थानीय निकाय वही महकमा है, जिससे कैप्टन ने नवजोत सिंह सिद्धू को हटाया था। कांग्रेस शुरू से किसानों के साथ खड़ी थी, इसलिए उसके लिए अकालियों और भाजपा को किसान विरोधी प्रचारित करना आसान भी था, जिसमें वह सफल रही। अकाली दल कृषि कानूनों के खिलाफ जब तक एनडीए से अलग हुआ तब तक कांग्रेस अपना काम कर चुकी थी। भाजपा तो सीधे तौर पर निशाने पर थी ही। आंदाेलन का एक असर यह भी था कि कई प्रत्याशी आजाद लड़े।

तो क्या यह मान लिया जाए कि इन क्षेत्रों के लोग विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस से खुश हैं?
-कांग्रेस के लिए यह जीत संभावित एंटीइंकम्बेंसी को कम करने का काम तो कर सकती है, लेकिन विधानसभा में जीत निश्चित मान लेना जल्दबाजी होगा। पिछली बार अकाली-भाजपा ने निकाय चुनाव जीत लिए थे और एक साल बाद ही विधानसभा चुनाव में वह नंबर 2 की पार्टी भी नहीं बची थी। हालांकि कांग्रेस और अकाली दल के कार्यकाल में कुछ बुनियादी अंतर है। अकाली भाजपा के साथ 10 साल से सत्ता में थे। वे एंटीइंकम्बेंसी के साथ नशे और भ्रष्टाचार के मुद्दे से बुरी तरह घिरे हुए थे। कैप्टन का मौजूदा कार्यकाल 4 साल का है। अब तक ऐसे मुद्दों का नकारात्मक प्रभाव ज्यादा नहीं है। कमजोर विपक्ष का फायदा उन्हें मिलता रहा है।

अकाली दल, भाजपा और आप का प्रदर्शन क्या संकेत देता है?
-अकाली दल और भाजपा 22 साल बाद अलग-अलग चुनाव लड़े। इनके वोट बंट गए। भाजपा इस बात पर खुश है कि वह बड़ी संख्या में प्रत्याशी उतार पाई। इन चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती उसी के सामने थी, क्योंकि एक तो वह अकेले चुनाव लड़ रही थी और दूसरी ओर उसके प्रत्याशियों का जगह-जगह किसान विरोध कर रहे थे। बावजूद उसके उसने जमीन तलाशने की कोशिश की है परंतु दबदबे वाले क्षेत्र में हार जाना उसके लिए भावी खतरे का इशारा है। उसके सामने कार्यकर्ताओं का मोराल लौटाना और गुटबाजी रोकने का कड़ा इम्तिहान है। अकाली दल के प्रदर्शन से यह तो स्पष्ट हो गया है कि वह नंबर 2 की पार्टी बन गई है, लेकिन सीधा विकल्प वह अभी नहीं बनी है। मुकाबले में आने के लिए उसे नई सोच और नई रणनीति बनाने की सख्त दरकार है। आम आदमी पार्टी के सामने कुशल नेतृत्व का संकट आज तक कायम है।

इन नतीजों से कैप्टन की राजनीति पर क्या असर होगा?
-पंजाब में कांग्रेस कैप्टन पर आश्रित है, यह जगजाहिर है। नतीजों से तय हो गया है कि आगामी विस चुनाव से पहले या चुनाव के दौरान आलाकमान उनसे मनचाहा नेगोसिएशन नहीं कर पाएगा। सिद्धू को लेकर आलाकमान का सॉफ्ट कॉर्नर है, लेकिन यहीं से नए कैप्टन की शुरुआत भी होगी। विस चुनाव को देखते हुए वे सिद्धू के प्रति कोमल रवैया रखेंगे या कठोर होंगे, यह भी आने वाले दिनों में तय होना है। साफ है कि 80 साल के होने जा रहे कैप्टन से ही कांग्रेस उम्मीद भी करेगी।

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